7 Aug 2026, 07:50 UTC130 views1 reactionsread 7 August 2026 प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वा…
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Signed Ishaan
7 Aug 2026, 07:50 UTC111 viewsread 7 August 2026 प्राप्त होता है | बीज मंत्रों के नियमित जप से सभी पापों से मुक्ति मिलती है | ऐसा व्यक्ति सम्पूर्ण जीवन मृत्यु के भय से मुक्त होकर जीता है व अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है ||
#शरीर_के_सात_चक_और_उनके_बीज_मंत्र
[1] मूलाधार चक्र : बीज मंत्र : " लं "
चक्र के देवता- भगवान गणेश
चक्र की देवी – डाकिनी जिसके चार हाँथ हैं, लाल आँखे हैं।
तत्व – पृथ्वी
रंग – गहरा लाल
बीज मंत्र – ‘ लं ‘
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिं…
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7 Aug 2026, 07:50 UTC72 viewsread 7 August 2026 (2) “ऐं” सरस्वती बीज :
यह मां सरस्वती का बीज मंत्र है, इसे वाग् बीज भी कहते हैं। जब बौद्धिक कार्यों में सफलता की कामना हो, तो यह मंत्र उपयोगी होता है। जब विद्या, ज्ञान व वाक् सिद्धि की कामना हो, तो श्वेत आसान पर पूर्वाभिमुख बैठकर स्फटिक की माला से नित्य इस बीज मंत्र का एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है ||
(3) “ह्रीं” भुवनेश्वरी बीज :
यह मां भुवनेश्वरी का बीज मंत्र है। इसे माया बीज कहते हैं। जब शक्ति, सुरक्षा, पराक…
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7 Aug 2026, 07:50 UTC73 views1 reactionsread 7 August 2026 🌹#बीज_मंत्र_क्या_है?🌹
बीज मंत्र पूरे मंत्र का एक छोटा रूप होता है जैसे की एक बीज बोने से पेड़ निकलता है उसी प्रकार बीज मंत्र का जाप करने से हर प्रकार की समस्या का समाधान हो जाता हैं. अलग- अलग भगवान का बीज मंत्र जपने से इंसान में ऊर्जा का प्रवाह होता हैं और आप भगवान की छत्र-छाया में रहते हैं I
मूल बीज मंत्र "ॐ" होता है जिसे आगे कई अलग बीज में बांटा जाता है I
ये सब बीज इस प्रकार जापे जाते हैं- ॐ, क्रीं, श्रीं, ह्रौं, ह…
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Signed Ishaan
7 Aug 2026, 07:50 UTC65 viewsread 7 August 2026 मन्त्रशास्त्र के बीजों का विवेचन करने के उपरान्त आचार्यों ने उनके रूप का निरूपण करते हुए बतालाया है कि :–
i) अ आ ऋ ह श य क ख ग ध ड ये वर्ण वायुतत्त्व संज्ञक;
ii) च छ ज झ ´ इ ई ऋ अ र ष ये वर्ण अग्नितत्त्व संज्ञक;
iii) त ट द उ उ ऊ ण लृ व ल ये वर्ण पृथ्वी संज्ञक;
iv) ठ थ ध ढ़ न ए ऐ लृ स ये वर्ण जलतत्त्व संज्ञक एवं
v) प फ ब भ म ओ और अं अः आकाशतत्त्व संज्ञक हैं।
vi) अ उ ऊ ऐ ओ औ अं क ख ग ट ठ ड ढ त थ प फ ब ज झ ध य स ष क्ष य…
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7 Aug 2026, 07:23 UTC82 viewsread 7 August 2026 राधारानी ने सबसे पहले किसे देखा था?
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ब्रजभूमि में एक अद्भुत और दिव्य चमत्कार हुआ, जब राजा वृषभानु और माता कीर्तिदा के घर एक दिव्य कमल पर श्री राधारानी का प्राकट्य हुआ। उनका जन्म किसी सामान्य बालिका की तरह नहीं, बल्कि स्वयं भगवान की परम आनंदमयी शक्ति के रूप में हुआ था।
परन्तु जन्म के बाद एक ऐसी बात हुई जिसने पूरे परिवार को चिंता में डाल दिया। नन्हीं राधा अपनी आँखें नहीं खोलती थीं। दिन बीतते गए, फि…
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7 Aug 2026, 06:37 UTC78 views1 reactionsread 7 August 2026 हनुमान जी और अहिरावण की कथा
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क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान श्रीराम को रावण जैसी महाशक्ति भी युद्धभूमि में पराजित नहीं कर सकी, उन्हें एक रात चुपचाप कोई उठाकर पाताल लोक ले गया था? वह कौन था जिसकी माया से पूरी वानर सेना धोखा खा गई? आखिर ऐसा क्या हुआ कि स्वयं बजरंगबली को पाताल लोक में उतरना पड़ा, जहां देवताओं का भी प्रवेश अत्यंत कठिन माना जाता था? और वहां हनुमान जी को ऐसा कौन मिला जिसने स्वयं को …
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7 Aug 2026, 06:37 UTC87 viewsread 7 August 2026 योद्धा ने अपना परिचय देते हुए कहा, "मेरा नाम मकरध्वज है। जब आपने लंका दहन के बाद समुद्र में प्रवेश किया था, तब आपके शरीर से निकली पसीने की एक बूंद एक मछली ने निगल ली थी। उसी से मेरा जन्म हुआ। बाद में अहिरावण ने मेरा पालन-पोषण किया और मुझे इस द्वार का रक्षक बना दिया।"
हनुमान जी ने उसे स्नेह से देखा। उन्होंने कहा, "पुत्र, आज मेरा धर्म मेरे प्रभु की रक्षा करना है।"
मकरध्वज ने सिर झुका दिया और बोला, "पिताश्री, अब आपको …
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7 Aug 2026, 06:37 UTC66 viewsread 7 August 2026 नवग्रह होम की विधि और ग्रहदोष निवारण के दान और मंत्र:
नौ ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) मनुष्य के कर्मानुसार उसे फल देते हैं।
जब कोई ग्रह प्रतिकूल होकर रोग, कष्ट या धन-हानि देता है, तो उसकी विशेष समिधा से हवन करने पर वह शांत और प्रसन्न हो जाता है:
सूर्य :
अर्क (मदार) की समिधा — आरोग्यता और ओज हेतु।
चंद्रमा :
पलाश (ढाक) की समिधा — मानसिक शांति और बुद्धि हेतु।
मं…
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7 Aug 2026, 06:37 UTC67 viewsread 7 August 2026 परशुराम कुंड की पावन कथा
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जहाँ भगवान परशुराम को मिला मातृ-हत्या के दोष से उद्धार
भारत की पावन धरती पर एक ऐसा तीर्थ भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि वहीं भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को मातृ-हत्या के दोष से मुक्ति मिली। आज वही स्थान परशुराम कुंड के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजनीय है।
महर्षि जमदग्नि और उनकी धर्मपत्नी माता रेणुका तप, संयम और सतीत्व की प्रतिमूर्ति थे। माता रेणुका का पतिव्रत…
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7 Aug 2026, 06:36 UTC63 views1 reactionsread 7 August 2026 लगातार प्रसाद वितरण करते रहने के कारण लोगों के मन में भी आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है। इससे किसी के भी मन में आपके प्रति राग-द्वेष नहीं पनपता और आपके मन में भी उसके प्रति प्रेम रहता है।
लगातार भगवान से जुड़े रहने से चित्त की दशा और दिशा बदल जाती है। इससे दिव्यता का अनुभव होता है और जीवन के संकटों में आत्मबल प्राप्त होता है। देवी और देवता भी संकटों के समय साथ खड़े रहते हैं।
भजन, कीर्तन, नैवेद्य आदि धार्मि…
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Signed Ishaan
7 Aug 2026, 06:36 UTC66 views1 reactionsread 7 August 2026 क्यों करते हैं प्रसाद वितरण
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'पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।'
अर्थ : जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप में प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। - श्रीकृष्ण
प्रासाद चढ़ावें को नैवेद्य, आहुति और हव्य से जोड़कर देखा जाता रहा है, ल…
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Signed Ishaan
Showing the 12 most recent of 39 posts we hold for @spiritualupdate. View and reaction counts are the latest single reading for each post, not a live figure, and a recent post is still accumulating both. A view count marked ≈ was rounded by Telegram before we ever saw it — t.me prints views in full below 1,000 and to three significant figures above, so ≈1,200,000 means somewhere between 1,150,000 and 1,249,999. Unmarked counts are exact. Text is reproduced from the public post preview and truncated for length.